आईने में कौन है? क्या ये वही चेहरा है?
वक़्त की ये रेत है, हर पल जो गहरा है।
हाथों से फिसला, वो पल जो संभाल न पाया,
बस यही कसक है, जो बनके परछाई साथ आया।
गुज़री हुई बात, पर दिल से गुज़रती नहीं...
कमरे में अँधेरा, और फ़ोन की स्क्रीन की रौशनी,
यादों की धुन पे, बजती है फिर से वो सरगोशी।
कुछ बातें अनकही, कुछ वादे जो अधूरे रहे,
आज भी चुभते हैं, जैसे काँच के वो टुकड़े रहे।
कौन था ग़लत? कौन था सही? फ़ैसला कहाँ हो पाया?
मैंने खोया है सब, जब मैंने तुम्हें अपनाया।
वो भरोसा टूटा, जैसे शीशा ज़मीन पे गिरे,
हर बार जोड़ना चाहा, पर सिर्फ़ हाथ ही मेरे फँसे।
मुस्कुराना सीख लिया, पर आँखें आज भी नम हैं,
क्योंकि वो रिश्ते नहीं, वो मेरी ज़िंदगी के अहम पन्ने थे।
परछाई पीछा करती है, हर लम्हा ये तन्हाई,
कहती है वापस आ, जहाँ तूने दी थी दुहाई।
पर अब रास्ता बंद है, और पुल जल चुके हैं पीछे,
सिर्फ़ आगे बढ़ना है, ज़ख़्मों को सींचे-सींचे।
वो दिन गए, वो रातें गईं, बस रह गई कहानी,
टूटा दिल, बिखरी बातें, यही मेरी निशानी।
दिल पे बोझ लेकर घूमता हूँ, किसे दिखाऊँ मैं?
सब कहते हैं 'ठीक हो', पर सच कैसे बताऊँ मैं?
कोशिशें हज़ार, खुद को बदलने की थी,
पर आदतें पुरानी, ये ज़िद नहीं टलने की थी।
हर मोड़ पर डर है, कहीं फिर न वो गलती करूँ,
कहीं फिर से किसी अपने को, बातों से न मैं डरूँ।
अब भीड़ में भी गुम हूँ, शोर भी सुनाई नहीं देता,
क्योंकि अंदर का सन्नाटा, किसी को सुनाई नहीं देता।
काश! पलट पाता मैं, वो तारीख़, वो दिन,
शायद मेरी ज़िंदगी इतनी बे-रंग न होती, रंगीन!
परछाई पीछा करती है, हर लम्हा ये तन्हाई,
कहती है वापस आ, जहाँ तूने दी थी दुहाई।
पर अब रास्ता बंद है, और पुल जल चुके हैं पीछे,
सिर्फ़ आगे बढ़ना है, ज़ख़्मों को सींचे-सींचे।
वो दिन गए, वो रातें गईं, बस रह गई कहानी,
टूटा दिल, बिखरी बातें, यही मेरी निशानी।
कोई मलाल नहीं, अब कोई शिकवा नहीं,
जो लिखा था किस्मत में, उसका अब दिखावा नहीं।
ये दर्द ही मेरी प्रेरणा है, मेरी सबसे बड़ी ताक़त,
क्योंकि इससे लड़कर ही, मैंने सीखी है इबादत।
मैं टूटा हूँ, बिखरा हूँ, पर हारा नहीं हूँ अभी,
ये आख़िरी जंग है, इसे लड़ेगा ये कवि।
अंधेरे से लड़कर, रौशनी को छूना है...
बीती बात को दिल से, अब दूर फेंकना है...
हर सुबह एक नई शुरुआत, ये मनीष खुद से कहता हूँ,
पर शाम होते ही, पुरानी यादों में बहता हूँ।
वो चेहरा, वो हँसी, वो छोटी-छोटी बातें,
भूला नहीं हूँ कुछ भी, ये काली-अँधेरी रातें।
मेरे गानों में दर्द है, पर ये मेरी पहचान है,
हर एक लफ़्ज़ में छुपा, एक गहरा इम्तिहान है।
ये मेरा Rap नहीं, ये मेरे दिल की पुकार है,
जो कहती है 'चल आगे', पर कदमों में भार है।
हाँ! मैं थक गया हूँ, पर रुकना नहीं सीखा,
क्योंकि ज़िंदगी ने मुझे, बस यही पाठ है लिखा।
परछाई पीछा करती है, हर लम्हा ये तन्हाई,
कहती है वापस आ, जहाँ तूने दी थी दुहाई।
पर अब रास्ता बंद है, और पुल जल चुके हैं पीछे,
सिर्फ़ आगे बढ़ना है, ज़ख़्मों को सींचे-सींचे।
वो दिन गए, वो रातें गईं, बस रह गई कहानी,
टूटा दिल, बिखरी बातें, यही मेरी निशानी।
बस... एक साँस और...
पीछे नहीं देखना...
परछाई... फ़ीकी पड़ रही है...
अब सिर्फ़ मैं... और मेरा सफ़र...