कमरे की ये छत, जैसे कैदखाने की दीवार
हर दिन वही दोहराव, न कोई मंज़िल, न कोई यार
सब पूछते 'कैसे हो?', मैं बस कह देता 'ज़ोरदार'
अंदर सब बिखर चुका, मैं अब बस हूँ एक बेकार
शोर-गुल से दूर, खामोशी में ढूंढ़ू सहारा
पर खामोशी भी चुभती, जैसे टूटा हुआ शीशा हो सारा
ये हँसी, ये दिखावा, दुनिया को बेवकूफ बनाने का खेल
असली दर्द छुपाता हूँ, जैसे समंदर में कोई रेल
हाँ, मैं हूँ ज़िंदा, पर शायद जीना भूल गया
भीड़ में खड़ा, पर अपना साया भी दूर गया
सांस लेता हूँ पर, ये रूह मेरी ख़ुश नहीं
रातों को जागता हूँ, आँखों में अब रोशनी नहीं
ये कैसा हाल है मेरा, किसको अब मैं समझाऊँ?
चेहरे पे मुस्कान, पर दिल का हाल बताता हूँ
कोई तो सुन ले, ये अंदर की आवाज़
मैं अंदर से ख़ाली हूँ, न कोई ख़्वाब, न कोई साज़
यादों का बक्सा जब भी खोलता हूँ, धूल उड़ती है
मनीष बीती हुई बातें, मेरी नसों में ज़हर घोलती हैं
गलतियाँ हुई मुझसे, या बस किस्मत का वार था
हर सुबह उठकर लड़ता, जैसे मैं ही एक गुनहगार था
मेरा फ़ोन बजता नहीं, क्योंकि किसी को मेरी फ़िक्र नहीं
और अगर कोई करे भी, तो मेरे पास कोई ज़िक्र नहीं
बस सिर झुकाए चलता हूँ, मंज़िल का पता नहीं
इस दौड़ने वाली दुनिया में, अब मेरी रफ़्तार सही नहीं
हर कदम एक दलदल है, खींचता मुझे नीचे
अब बस मैं हूँ और ये मेरा दर्द, जो मुझसे है चिपके
सांस लेता हूँ पर, ये रूह मेरी ख़ुश नहीं
रातों को जागता हूँ, आँखों में अब रोशनी नहीं
ये कैसा हाल है मेरा, किसको अब मैं समझाऊँ?
चेहरे पे मुस्कान, पर दिल का हाल बताता हूँ
कोई तो सुन ले, ये अंदर की आवाज़
मैं अंदर से ख़ाली हूँ, न कोई ख़्वाब, न कोई साज़
थक गया हूँ लड़ते-लड़ते, इस जंग का अंत कहाँ?
गिरता हूँ और उठने की हिम्मत, अब रही न यहाँ
बस एक उम्मीद की किरण, ढूंढता हूँ इन बादलों में
शायद कल हो बेहतर, पर आज हूँ इन अँधेरों में
शायद... बस शायद...
कल मैं फिर से... मुस्कुरा पाऊँ...