टूटी कसमें, बिखरे वादे,
दिल के कागज़ पर हैं आधे।
शोर में भी ख़ामोशी छाई,
ये कैसी है तन्हाई?
राहों पे अब धुंधला मंज़र,
ज़ख्म गहरे, दर्द समंदर।
घड़ी की सूई चलती, पर वक़्त रुका सा है,
आँखों में नमी है, ये शहर भी रूठा सा है।
कल जो थे मेरे अपने, अब वो परछाई बन गए,
मेरी हँसी को जैसे, कहीं दूर दफना गए।
भीड़ में भी मैं अकेला, ये कैसा है सज़ा?
हर मोड़ पे सवालों का, क्यूँ मिलता है पता?
वो कहते थे"सपनों को, तू छू के आना",
आज उन्हीं सपनों का, बन गया मैं अफ़साना।
यकीन की डोर टूटी, अब बस सवाल बाकी,
इस अधूरी दास्तान का, क्या होगा अंजाम साथी?
ज़िंदगी की रेस में, मैं पीछे छूट गया,
जो शीशा था दिल का मेरा, वो आज टूट गया।
हर आहट पे लगता है, शायद वो आएगा,
पर वक़्त की नदी में, सब बहता जाएगा।
हाँ, हूँ मैं टूटे तारों का, एक टूटा सा साज़,
मेरी रूह पुकारती, पर आती नहीं आवाज़।
याद है मुझे, वो बचपन के बेफ़िक्र लम्हे,
कहाँ गए वो रिश्ते, कहाँ गए वो गर्म लहजे?
अब तो फ़ोन की स्क्रीन पर, बस पुराने मैसेज,
जैसे दिल के अंदर, कोई बंद हो चुका पैसेज।
दुनिया कहती है"आगे बढ़ो, भूलो ये सब",
पर कैसे भूलूँ? जब यादें हैं हर पल और हर शब।
मैंने कोशिश की, बहुत की, पर गिर गया हर बार,
जैसे पतंग की डोर कटी, और छिन गया मेरा प्यार।
अब सिर्फ़ खालीपन है, कोई शोर नहीं,
इस गहरी रात की, कोई भोर नहीं।
ज़िंदगी की रेस में, मैं पीछे छूट गया,
जो शीशा था दिल का मेरा, वो आज टूट गया।
हर आहट पे लगता है, शायद वो आएगा,
पर वक़्त की नदी में, सब बहता जाएगा।
हाँ, हूँ मैं टूटे तारों का, एक टूटा सा साज़,
मेरी रूह पुकारती, पर आती नहीं आवाज़।
ये आंसू नहीं, मेरे टूटे हुए ख़्वाब हैं,
जो बह रहे हैं, पर दे रहे न कोई जवाब हैं।
अगर हिम्मत दूं खुदको, तो जीना चाहता हूँ,
इस दर्द के जाल से, अब निकलना चाहता हूँ।
एक आख़िरी दुआ है, सुन ले ऐ खुदा मेरे,
या तो सुकून दे दे, या ख़त्म कर दे ये फेरे।
I just want to breathe, I just want to live again...
मनीष ने किताबों में ढूंढा, ज़िंदगी का सच्चा सार,
सबने कहा"मोहब्बत" है, पर मुझे मिला बस ख़ार।
अब मैं खुद को देखता हूँ, तो पहचानता नहीं,
वो लड़का जो हँसता था, अब वो मानता नहीं।
ये अकेलापन मेरा, अब मेरा दोस्त बन गया है,
जो हर रात धीरे-धीरे, मुझको डस गया है।
रोशनी की तलाश में, अंधेरों से बात की,
इस दिल की हर धड़कन पे, बस दर्द की सौगात थी।
मैं हारी हुई बाज़ी हूँ, जिसे जीना है अभी,
पर उस जीत की चाहत ही, अब खो गई कहीं।
ज़िंदगी की रेस में, मैं पीछे छूट गया,
जो शीशा था दिल का मेरा, वो आज टूट गया।
हर आहट पे लगता है, शायद वो आएगा,
पर वक़्त की नदी में, सब बहता जाएगा।
हाँ, हूँ मैं टूटे तारों का, एक टूटा सा साज़,
मेरी रूह पुकारती, पर आती नहीं आवाज़।
तन्हाई.
ये अधूरी दास्तान...
बस एक ख़ामोश चीख़...
बस यही... बाकी है...
हाँ... बाकी है...