रात के दो बजे, कमरे में अकेलापन
दीवारों से बातें करूँ, कहाँ गया मेरा मन?
दिल के कागज़ को फाड़ूँ, हर पन्ना गीला है
ज़िंदगी की दौड़ में, मेरा हिस्सा फीका है।
चेहरे पे मुस्कान, पर अंदर से टूटा हुआ हूँ
भीड़ में भी, जैसे किसी ने लूटा हुआ हूँ।
ये कैसा दर्द है, जिसकी आवाज़ नहीं आती?
आँसू भी सूख गए, अब राहत नहीं भाती।
हाँ, मैं हूँ वो राही, जिसका रास्ता खो गया
सपनों का शहर था, पर अब सन्नाटा हो गया।
ये है दर्द, जो अंदर से चिल्लाता है
हर रोज़ मेरी रूह को ये खाता है।
ज़ख्म गहरे हैं, पर निशान नहीं दिखते
टूटे हुए दिल से, अब गीत नहीं लिखते।
हाँ, ये है दर्द... हाँ, ये है दर्द...
जो सीने में मेरे हर पल धड़कता है।
यादें चुभती हैं, जैसे कांच के टुकड़े
हर पल की कहानी में, गम के ही मुखड़े।
मैंने कोशिश की थी, इस आग को बुझाने की
पर ये चिंगारी है, जो नहीं थमने वाली।
लोग कहते, मनीष"आगे बढ़ो, वक्त सब भर देगा"
पर क्या वो जानेंगे, ये भार कितना कर देगा?
रिश्तों की डोर थी, जो कमज़ोर निकली
हर उम्मीद मेरी, क्यों इतनी झूठी निकली?
मैं ज़िद्दी हूँ, पर थक गया हूँ लड़ते-लड़ते
इस खालीपन से, जो रोज़ आता है बढ़ते-बढ़ते।
ये है दर्द, जो अंदर से चिल्लाता है
हर रोज़ मेरी रूह को ये खाता है।
ज़ख्म गहरे हैं, पर निशान नहीं दिखते
टूटे हुए दिल से, अब गीत नहीं लिखते।
हाँ, ये है दर्द... हाँ, ये है दर्द...
जो सीने में मेरे हर पल धड़कता है।
सवाल बहुत हैं, पर जवाब कहाँ से लाऊँ?
इस अंधेरे में, कोई रोशनी कहाँ से पाऊँ?
शायद यही मेरी किस्मत है, यही मेरी कहानी
जी रहा हूँ मैं, पर अधूरी है जिंदगानी।
पर सुनो! दर्द मेरा हथियार है, हार नहीं मानी है
आज भी लडूंगा, चाहे रात तूफानी है।
दर्द... हाँ, ये मेरा दर्द है।
और ये खत्म नहीं होगा...
जब तक मैं ज़िंदा हूँ।