आह—आह—
ओहे—ओहेय—
पहाड़ बहुत समय से खड़ा है
पर कभी नहीं कहता कि वह ऊँचा है
नदी लंबा रास्ता तय करती है
पर कभी नहीं कहती कहाँ पहुँचती है
सिर्फ इंसान का दिल
बार-बार पूछता रहता है
मैं क्या खोज रहा हूँ
इस रास्ते पर चलते हुए
आह—आह—
साँस हवा में बिखर जाती है
हवा खाली मैदानों से गुजरती है
कुछ भी पीछे छोड़े बिना
बादल आसमान में भटकते हैं
कहीं भी ठहरते नहीं
पकड़ने की कोशिश करने वाले हाथों में
कुछ भी नहीं बचता
पर खाली दिल में
दुनिया आ सकती है
ओहे—ओहेय—
जीवन जोड़ना नहीं है
बल्कि छोड़ना सीखना है
परत दर परत
मैं सब छोड़ देता हूँ
आह—आह—
पत्ता गिरता है
और जंगल फिर शांत हो जाता है
लहर गुजरती है
और नदी फिर साफ हो जाती है
इंसान का दुख भी
ऐसा ही है
ओहे—ओहेय—
बहुत कुछ होना
दुनिया को बड़ा नहीं बनाता
जब कुछ भी नहीं बचता
तब आसमान दिखाई देता है
आह—आह—
मैं पहाड़ हूँ
मैं नदी हूँ
यह बहती साँस भी
मैं ही हूँ
इस विशाल ब्रह्मांड में
मैं एक पल ठहरने वाली हवा हूँ
ओहे—ओहेय—
मैं हवा बन जाता हूँ
मैं धरती बन जाता हूँ
और फिर लौट जाता हूँ
प्रकृति में