ये कैसी जंग है, जो खुद से मैं लड़ रहा?
किस बात का बोझ है, जो रात-दिन ढो रहा?
हर रोज़ गिरता हूँ, फिर भी मैं क्यों अड़ा?
ख़ुद से सवाल है, ये वक़्त कहाँ मुड़ा?
(ख़ुद से सवाल...)
शीशे में देखो तो, वो चेहरा मेरा नहीं,
मुस्कान है फरेबी, ये दुनिया सही नहीं।
चीख़ें दबी हैं अंदर, सुनता नहीं कोई भी,
आज हर बात कहूँगा, चाहे लगे वो रोई हुई।
हाँ, मैं हूँ वो इंसान, जो टूटा पर झुका नहीं,
ज़िन्दगी की किताब में, एक पन्ना सूखा नहीं।
अगर पलट सकूँ मैं वो वक़्त, जहाँ मैंने गलती की,
काश! उस मोड़ पे मैंने, थोड़ी सी नरमी ली।
पर जो बीत गया, वो तो वापस नहीं आएगा,
ये खालीपन, शायद अब कभी नहीं जाएगा।
फ़ोन में कॉन्टैक्ट्स भरे, पर बात किससे करूँ?
हर रिश्ता है झूठा, मैं किस पे एतबार करूँ?
यहाँ कंधे नहीं मिलते, बस मिलते हैं ताने,
मैं चुप रहूँ भी तो कैसे, दिल में हज़ारों अफ़साने।
गुस्सा आता है मुझको, उस हर एक शक्ल पे,
जिसने मज़ाक उड़ाया, मेरी हर एक अक्ल पे।
तुम कौन होते हो भाई, मेरी राह बताने वाले?
ख़ुद के दामन में छेद, और दूसरों को जलाने वाले?
हाँ! मैं हूँ ज़िद्दी, थोड़ा पागल, थोड़ा आवारा,
पर अपनी राह का मैं ख़ुद ही हूँ किनारा।
मुझे माफ़ नहीं करना, मेरी बेइज्जती याद रखना,
जब आऊँगा लौट के, तब मुँह ना तुम ढकना।
ख़ुद से सवाल है...
ये रातें इतनी भारी क्यों हैं, नींद क्यों नहीं आती?
क्या सच में मैं ही बुरा हूँ, या मेरी किस्मत की ये घाटी?
दिल कहता 'रुक जा', पर दिमाग कहता 'चल',
इस दोहरी लड़ाई में, क्या होगा मेरा कल?
मैं थक चुका हूँ अब, ये नकाब उतारना चाहता हूँ,
नकली हँसी के पीछे, खुद को सँवारना चाहता हूँ।
क्या ये सब छोड़ दूँ, या आखिरी बार लड़ूँ?
ये फैसला मेरा है, मैं कहाँ जाके मरूँ?
ठीक है, तो टूटा हूँ, पर बिखरा नहीं हूँ मैं,
ये घाव जो दिखते नहीं, वही मेरी हैं पहचान।
अब नहीं पूछूँगा किसी से, कोई राह नहीं लूँगा,
अपने टूटे पंखों से ही, नया आसमान बुनूँगा।
मुझे मेरा दर्द मुबारक! यही मेरी ताकत है,
आज से मेरी जीत, सिर्फ मेरी इबादत है।
मनीष अब आँसू पोंछ, और कलम को उठा,
ये आग तेरी अपनी है, इसे दुनिया को दिखा।
जो नहीं माने कल, वो आज झुक जाएंगे,
मेरे अल्फाज़ उनके दिलों तक पहुँच जाएंगे।
ये आख़िरी चांस है, इसे बर्बाद नहीं करना,
गिरना, उठना है फ़ितरत, बस फ़रियाद नहीं करना।
अब और नहीं...
ख़ुद से सवाल बंद...
अब बस जवाब...
अब बस जवाब...